Friday, January 11, 2019

Cognitive Dissonance उर्फ सेक्युलरों की कायरता।

अपनी भूल को भूल मानने से जो इन्कार किया जाता है, उसको सही ठहराने के लिए जो जो शाब्दिक गुलाण्ट मारे जाते हैं या फिर यथासंभव जहां दबाव और दबंगाई से भी काम लिया जाता है कि तुम्हारी औकात क्या है जो हमें सही गलत का फर्क सिखाओगे - उस व्यवहार को कोग्निटिव डिसोनान्स कहा जाता है ।
कई बार लिख चुका हूँ कि कुछ साल पहले मैं भी खासा औरों जैसा सेक्युलर हुआ करता था, आज अगर हिन्दुत्ववादी कहलाता हूँ तो यह भी विरोधियों का लगाया हुआ लेबल है, मैं केवल अपने समाज के अस्तित्व को मिली हुई चुनौती की बात कर रहा हूँ, सामने दिखते खतरे की बात कर रहा हूँ और चूंकि खतरा है, उसका प्रतिकार कैसे किया जाये इसकी बात करता हूँ । इसके लिए संघी कहलाता हूँ जो कि असलमें हर जागृत हिन्दू के लिए गिरोह द्वारा दी हुई गाली है। संघ का मैं कोई पदाधिकारी नहीं हूँ लेकिन संघी कहलाता हूँ। हर हिन्दू जो हिंदुओं को घेरे हुए संकटों की बात करेगा, आज की तारीख में पहले भक्त और बाद में संघी कहलाएगा।
मेरी सेक्युलरिता दूर करने में किसी व्यक्ति का नहीं लेकिन मीडिया का ही योगदान है । खबरों ने विचलित किया जिसके कारण नेट पर संबन्धित खबरें पढ़ने लगा। नेट की व्याप्ति की वजह से कड़ियाँ जुड़ती गयी, पढ़ाई बढ़ती गयी। फिर चुप रहा नहीं गया । मैं भी बोलने लिखने लगा।
यहाँ मैंने पाया कि लोग जुडते गए, कारवां बनता गया तो वॉल खुली होने के कारण वे लोग भी आ गए जिनकी विचारधारा को लेकर मैं लिख रहा था । दुखद है कि विमर्श से अधिक विरोध में थे क्योंकि उनकी बात को मैं बिना जाँचे परखे स्वीकारने को तैयार नहीं था । इसलिए मुझे संघी कह देना उनके लिए सब से आसान बात थी ।
इसके बाद मैंने पाया कि अपने ही परिजन या परिचितों में भी लोग इन बातों को लेकर असहज थे। जहां कोई बाहरी नहीं था वहाँ भी वे असहज थे । कमाल की बात यह थी कि मेरी बातों की कोई काट उनके पास नहीं होती थी, कई तो दबे सुरों में सहमत भी होते थे, लेकिन समर्थन ? ना बाबा ना !
लेकिन एक बात समझ में आने लगी कि यह उनका सेक्युलरिज़्म से लगाव नहीं है, ये वर्तमान पोलिटिकल करेक्टनेस के नेरेटिव के शिकार हैं और बोलने से डरते हैं । कुछों के डर असली होंगे, लेकिन अधिकतर लोग अपने ही डरों से डरते हैं । जो भय उनके अन्तर्मन में स्थापित है, वही उन्हें किसी बाहरी व्यक्ति से अधिक भयभीत करने में सक्षम है ।
लेकिन न ये अपने डर का सामना करना चाहते हैं और ना ही मानना चाहते हैं कि वे डरते हैं । जिस बात का उन्हें डर है वह बात लड़ने योग्य है या नहीं, वह विचारधारा इनका सामाजिक अस्तित्व समाप्त करने को प्रतिबद्ध है या नहीं इसपर सोच तो बहुत आगे की चीज है । ये सब सोचने से भी इन्हें बहुत डर लगता है ।
इसलिए ये जब सेक्युलरिज़्म के नाम से चिल्लाएँ तो चिंतित न हों, ये दूसरों का इन्हें डर है जिसके कारण वे आप पर चिल्लाते हैं। बाद में धीमें से पूछेंगे - आप को डर नहीं लगता ?
इससे और क्या सबूत चाहिए ?
वैसे कोग्निटिव डिसोनान्स पर एक पोस्ट लिखी थी कभी, जो शांति से संबन्धित है, चाहे तो यहाँ देख सकते हैं ।
https://bit.ly/2QAWRFj
https://bit.ly/2TMetA5

No comments:

Post a Comment