कल मैंने जो मेरे मित्र Saptarshi Basu जी के फेसबुक के इंग्लिश लेख का अनुवाद किया था उसमें एक मुद्दा था जिसे लेकर यह पोस्ट विशेष रूप से अलग से लिख रहा हूँ । आप से अनुरोध है कि इसे सेव अवश्य कर लें। शेयर या कॉपी पेस्ट करना आप की इच्छा।
सर्वप्रथम तो पाकिस्तान अपना पानी की सप्लाई सुरक्षित कर लेगा । आज भारत सरकार जो पानी की आपूर्ति का अहिंसक शस्त्र के रूप में उपयोग कर रही है इसलिए आज देश को पता चल रहा है कि ये हथियार हमारे पास पहले से उपलब्ध था, हिन्दू मानसिकता के चलते हम इसका उपयोग करने से कतराते रहे। हुसेन का तड़पना हमें भी पीड़ा अनुभव कराता है लेकिन ये हम भूलते हैं कि उसे तडपा तड़पा कर मारनेवाले भी तो मुसलमान ही थे । शायद मुहम्मद के नाती थे इसलिए हुसेन की मौत event बन गई इतना ही है ।
आगे देखते हैं ।
हिमालय से जिनको पानी मिलता है वे नदियों पर पाकिस्तानी नियंत्रण होगा। चीन को लालच देकर वे बांध बांधकर भारतीयों का जीना दूभर कर सकते हैं, और भी कई सारे हथकंडे अपना सकते हैं । यह याद रखें कि घेरा डालकर भूखे मारनेवाला युद्ध भारत में इस्लाम ही लाया है। हिंदुओं के युद्ध बस्तियों से अलग होते थे ताकि नागरिकों को तथा कृषि को हानी न हों। स्त्रियों के साथ अत्याचार नहीं, बच्चों बूढ़ों को यतनाएँ नहीं और कोई गुलाम बनाकर बेचना नहीं । खेत जलाना, घेरा डालकर भूखे मारना, नागरी बस्तियों पर हमले, स्त्रियों पर अत्याचार, उनको भोगदासी बनाकर बेचना, बच्चों पर अत्याचार, पुरुष हो रहे हर बच्चे को भी काट देना ये सभी की पहचान इस्लाम ने ही भारत को कराई है । और ये सभी कल्पनाएँ नहीं लेकिन उनके ही लोगों ने गर्व से गाथाएँ लिखी हैं ।
और भारत के मुसलमान टीवी के कैमरा पर गर्व से कहते हैं कि वे हमारे हीरो हैं ।
वैसे आज भी भारत इंडस वॉटर ट्रीटी का उल्लंघन नहीं कर रहा है बस अपने हिस्से का पानी ही पूरा उपयोग करने की बात कर रहा है जिसमें से अधिकतर पाकिस्तान जाता रहा है क्योंकि अपने यहाँ उसे अन्यत्र उपयोग करने के लिए जो इनफ्रास्ट्रक्चर चाहिए वह नहीं था । लेकिन पाकिस्तान अगर कश्मीर कब्जाता है तो क्या पाकिस्तान उस ट्रीटी को मानेगा ? कब्जे में आई चीज को लेकर मुसलमान, कानून को कितना मानते हैं, क्या आप को अलग से बताना होगा ?
अस्तु, विषयांतर हुआ। कश्मीर पर नियंत्रण पाकिस्तानी सेना को मिलिटरी हाय ग्राउंड देगी जहां से सपाट मैदानी इलाकों पर हमले करना आसान होगा। और पानी जीवन होता है, उसपर उनका नियंत्रण हो जाये तो क्या हो सकता है इसपर सोचिए, अगली बार कश्मीर की आज़ादी की बात उठानेवाले को चार सवाल करने के लिए आप खुद सक्षम हो जाएँगे । वे ये बात कभी नहीं करते कि कश्मीर जाने से क्या नुकसान है समूचे भारत को । हिन्दू हैं तो शायद जानते नहीं और मुसलमान हैं तो उनके लिए वे गजवा ए हिन्द को मदद कर के अपने लिए जन्नत का रिज़र्वेशन करा रहे हैं ।
इसीलिए पाकिस्तान ने अशांत रखा है कश्मीर
सबसे पहले इस बात को जानना होगा कि पर्यटन व्यवसाय एक अत्यंत भंगुर व्यवसाय है। (बर्ड फ्लू और SARS के समय चाइना का क्या नुकसान हुआ और चाइना ने कैसे खबरें दबाई थी, कभी जान लीजिये। ये खबरें और अफवाहें चलाना भी Art Of War के पहले ही चैप्टर में एक उपयुक्त रणनीति गिनाई गयी है । अस्तु, आप के यहाँ किसी भी तरह का खतरा है तो पर्यटक आना बंद कर देंगे । खतरे की अफवाहें भी पर्यटन को अनगिनत नुकसान करा सकती हैं और यहाँ तो पाकिस्तान ने इतने नियमित हादसे करवाएँ जिनकी खबरें रोजाना की हेडलाइंस तब तक बनती रही जब तक दुनिया के मन में यह पूरी तरह अंकित हो गया कि कश्मीर जाना मौत को बुलाना है । कोई दूसरे से कहता - ये पढ़ा कश्मीर के बारे में ? तो दूसरा उदासीनता से प्रतिप्रश्न करता - क्या हुआ, आज कितने मारे गए ?
कश्मीर को भारत से जोड़े रखने की कीमत थी जो सरकारों ने कुछ ज्यादह ही चुकाई। और हर काम करने की कीमत समय के साथ बढ़ती जाती है, कई काम अपनी जिंदगी में भी होते हैं जो सही समय पर न करने से बाद में असाध्य हो जाते हैं । गंभीर बीमारियों के साथ ये कहानी आम है, पहले इगनोर की गयी बीमारी बाद में जानलेवा होती है । इन्दिरा जी अपने समय में ही कर देती या राजीव जी भी कठोर उपाय कर देते तो आज जितना मुश्किल नहीं होता। मीडिया उनके साथ था। या फिर ये बात मीडिया के साथ साथ गांधी परिवार की देशनिष्ठा पर भी संदेह उठाती है । वैसे भी वे कोई बलिदान नहीं हुए, बल्कि अपने ही स्वार्थ के लिए बनाए दैत्यों से निपटाए गए।
कश्मीर में बेरोजगारी फैली क्योंकि सरकार की रोजगार देने की क्षमता सीमित होती है । किसी भी स्टेट में जो _IDC होती है उसका काम ही होता है कि उद्योगों को बुलाएँ, आकर्षक सुविधाएं मुहैया करें ताकि उनकी जरूरतें पूरी करने के लिए छोटी छोटी इकाइयां खड़ी हों जिनसे स्थानिकों को रोजगार मिले। और ये पैटर्न कोई भारत का ही नहीं बल्कि अन्य देशों में भी होता है।
लेकिन कश्मीर के किसी भी सरकार ने कश्मीर में यह स्थिति आने नहीं दी। क्या अब्दुल्ला पिता पुत्रों को यह समस्या समाधान समझ में नहीं आता था ? वे ही क्यों, जितने भी मुसलमान मुख्यमंत्री हुए, क्या किसी को यह समस्या का समाधान समझ में नहीं आता था ? गुलाम नबी आज़ाद तो केन्द्रीय मंत्री भी रहे हैं, क्या उनको यह समझ नहीं थी ? और जान लीजिये, ये सभी लोग बहुत इंटेलिजंट हैं, कोई बुद्धू नहीं । तो फिर इस समस्या को समस्या बनाए क्यों रखा यह सवाल तो उठता ही है ।
वैसे गुलाम नबी आज़ाद के बेटे का नाम सद्दाम है, संजोग काफी रोचक लगा।
सरकार की रोजगार देने की सीमाएं, कानून के कारण उद्योगों का न आ पाना, पर्यटन समाप्त होने से डूबते स्वरोजगार और शिक्षा का अभाव । असंतोष और अशांति का बारूद ठसाठस भरा हुआ था जिसमें पाकिस्तान ने इस्लाम की बत्ती लगा दी। और ये बम मधुमक्खी के छत्ते जैसा है, अनगिनत कंपार्टमेंट्स हैं, कहीं कोई तो कहीं कोई और, निरंतर विस्फोट होते रहते हैं - जैसे पत्थरबाजियाँ, कहीं बम, काही आत्मघाती फिदायीन हमले।
अगर कश्मीर के नेता वहाँ रोजगार उत्पन्न करने के लिए उद्योग बुलाते तो शांति रह सकती थी क्योंकि आदमी अपनी रोटी बचाने के लिए लड़ता है । लेकिन सभी ने अपनी रियासत बचाने की सियासत की जिसमें अब्दुल्ला खानदान का हिस्सा सब से बड़ा है - फारुख साहब की गुस्से की ड्रामेबाजी या ओमर का विक्टिम विक्टिम खेलना इसको छुपा नहीं सकती।
अब इतने साल हो गए जिससे वहाँ के महिलाओं में भी कट्टरपन भर गया है, माताएँ कह रही हैं कि बेटा बिना शहीद हुए लौट आए तो खुद ही उसका गला दबा दूँगी । सामान्यत: कोई माँ ये नहीं कहेगी, और दीन के लिए कुर्बान होने को बरगलाना ही कहेगी - जो आज फिलिस्तीन की महिलाएं उनके नेताओं से कह रही हैं - लेकिन आज इतने साल की सड़न ने माताओं की सोच को भी संक्रमित कर लिया है । स्वयं महिलाएं होकर भी हिन्दू महिलाओं पर हुए अत्याचारों के लिए उन्हे अपने घर के पुरुषों पर कोई शर्मिंदगी नहीं है ।
आज इसलिए कश्मीर को लेकर चीनीयों का ऊईगुर स्टाइल का इलाज जायज लगता है ।
अस्तु, कश्मीर में अशांतता में पाकिस्तानी निवेश क्यों ?
पाकिस्तान चाहता है कि कश्मीर में अशांतता, लगातार सैनिकों की मौतें और कश्मीरियों पर होनेवाले बेहिसाब खर्चे से भारत में यह वातावरण बने कि क्यों पकड़े रखे हो कश्मीर को, जाने दो पाकिस्तान में ! यहाँ प्रदूषण जैसे लोग कश्मीर की आज़ादी के वकील बने घूम रहे हैं। वामी भी विद्यालयों में कश्मीरियों के हिन्दू आक्रमण से संघर्ष का उदात्तीकरण करने लगे हैं । कुल मिलकर यह जनमत बनाना है कि भारत कश्मीर को छोड़ने पर मजबूर हो जाये।
इसीलिए यह समझने का प्रपंच किया है कि यह भूल कितनी और महंगी पड़ेगी। वैसे भी लंबे समय से चलती आ रही बीमारी का इलाज भी लंबा ही चलता है, यहाँ surgery नहीं हो सकती, वही तो पाकिस्तान और उसके backers चाहते हैं ।
और हाँ, तारेक फतह ने सही कहा था कि पाकिस्तान इज अ स्टेट ऑफ माइंड। समस्या इस माइंड को चलानेवाले प्रोग्राम - सॉफ्टवेयर से है, और उस सॉफ्टवेयर का नाम या उसके लेखक का नाम लेना फतह हमेशा टाल ही नहीं जाते, बल्कि उसका बचाव भी करते हैं । उनकी अपनी मजबूरीयां होंगी।